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“नंदा अष्टमी: जब मां नंदा की विदाई पर पूरा उत्तराखंड आंसुओं में डूब जाता है”

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां हर पर्व और त्योहार केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि गहरे मानवीय भावनाओं से भी जुड़ा होता है। इन्हीं में से एक है नंदा अष्टमी का पर्व, जिसे यहां के लोग अपनी बेटी की विदाई जैसा मानते हैं। इस दिन गांव-गांव में ऐसी परंपरा देखने को मिलती है, जब पूरा इलाका ढोल-दमाऊं की थाप के बीच भावुक होकर रो पड़ता है।

मां नंदा को मानते हैं बेटी

उत्तराखंड की लोक आस्था में मां नंदा को बेटी का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि नंदा देवी हर साल नंदा अष्टमी पर अपने मायके आती हैं और कुछ दिनों तक यहीं रहती हैं। गांव-गांव के लोग मां नंदा का स्वागत वैसे ही करते हैं, जैसे कोई अपने घर आई हुई बेटी का करता है।

ब्रह्मकमल से शुरू होता है पर्व

नंदा अष्टमी से दो दिन पहले गांव के लोग, जिन्हें फुलारी कहा जाता है, कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए ऊंचे हिमालय की चोटियों पर जाते हैं। वहां से वे ब्रह्मकमल लेकर आते हैं। मान्यता है कि इन्हीं ब्रह्मकमलों के रूप में मां नंदा मायके आती हैं। पूरे रास्ते में ये लोग देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और मां नंदा को अपने साथ लेकर गांव पहुंचते हैं।

मंदिर में होता है मां नंदा का आगमन

जब फुलारी ब्रह्मकमल लेकर मंदिर पहुंचते हैं, तो वहां उपस्थित पश्वा (वह व्यक्ति जिस पर देवी अवतरित होती हैं) के शरीर में मां नंदा का आवेश आता है। पश्वा ब्रह्मकमल स्वीकार करता है और मंदिर परिसर में भक्तों को आशीर्वाद देता है। इस दौरान पूरा गांव उमड़ पड़ता है, मानो कोई बेटी अपने मायके आई हो और सब उसकी झलक पाने के लिए बेताब हों।

ढोल-दमाऊं की थाप पर होता है स्वागत

मां नंदा का स्वागत पारंपरिक ढोल-दमाऊं की थाप पर किया जाता है। लोग नाचते-गाते हैं और मां का श्रृंगार करते हैं। पूजा-अर्चना के दौरान मां को प्रसन्न करने के लिए परंपरागत रीति-रिवाज निभाए जाते हैं।

सबसे भावुक क्षण – बेटी की विदाई

इस पर्व का सबसे भावुक क्षण वह होता है, जब मां नंदा की प्रतिमा को वापस उनके ससुराल कैलाश विदा किया जाता है। विदाई के समय गांव की महिलाएं रो पड़ती हैं, बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं और पूरा माहौल गमगीन हो उठता है। यह क्षण बिल्कुल किसी बेटी की विदाई जैसा होता है।

मां नंदा भी होती हैं भावुक

लोकमान्यता है कि इस समय मां नंदा भी पश्वा पर अवतरित होकर भावुक हो जाती हैं। आंसुओं के साथ वह भक्तों को अगले वर्ष फिर मायके आने का वादा करती हैं और अपने ससुराल लौट जाती हैं।

आस्था और भावनाओं का संगम

नंदा अष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की बेटी और मां के रिश्ते का प्रतीक है। यह पर्व बताता है कि यहां त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज की गहरी भावनाओं और परंपराओं से जुड़े होते हैं।

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