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‘संतान पाने का अधिकार मौलिक’: हाईकोर्ट ने रद्द किया राज्य प्राधिकरण का आदेश, 56 वर्षीय पति को मिली कानूनी राहत।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) सेवाओं से इनकार करने वाले राज्य अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस सुवीर सहगल की पीठ ने यह निर्णय उन दंपती की याचिका पर सुनाया, जिन्होंने साल 2024 में अपने इकलौते बेटे को पीलिया के कारण खो दिया था।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता दंपती (पत्नी 47 वर्ष और पति 56 वर्ष) के दो बच्चे थे। बेटी की शादी हो चुकी थी और बेटे की आकस्मिक मृत्यु के बाद उन्होंने वंश को आगे बढ़ाने के लिए आईवीएफ (IVF) का सहारा लेना चाहा। हालांकि, अपीलीय प्राधिकरण ने 6 फरवरी 2025 को उनके अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पति की उम्र 55 वर्ष की कानूनी सीमा को पार कर गई है और रजोनिवृत्ति (Menopause) व चिकित्सा जोखिम के कारण यह संभव नहीं है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

जस्टिस सुवीर सहगल ने एआरटी अधिनियम, 2021 की धारा 21(जी) की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए:

  • व्यक्ति बनाम दंपती: कोर्ट ने माना कि कानून में दी गई आयु सीमा (महिला के लिए 50 और पुरुष के लिए 55 वर्ष) किसी व्यक्ति विशेष पर लागू होती है जो अपनी कोशिकाओं (Gametes) का उपयोग करना चाहता है। यह किसी दंपती को सेवा देने से रोकने का आधार नहीं हो सकता, विशेषकर तब जब ‘दाता अंडों’ (Donor Eggs) के उपयोग की अनुमति है।

  • चिकित्सा जोखिम कोई आधार नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एआरटी प्रक्रिया में शामिल संभावित चिकित्सा जोखिम या आनुवंशिक असामान्यता की आशंका इस प्रक्रिया पर रोक लगाने का कानूनी आधार नहीं हो सकती।

  • लिंग निर्धारण का डर निराधार: प्राधिकरण द्वारा लिंग निर्धारण की आशंका के आधार पर आवेदन रद्द करने को कोर्ट ने अनुचित माना।

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