फांसी की प्रक्रिया की एक्सपर्ट कमेटी से समीक्षा करा सकती है सरकार, SC ने दिया संकेत

प्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी देने के मौजूदा तरीके को बदलकर नसों में जहरीला इंजेक्शन देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने हालांकि साफ किया कि केंद्र सरकार चाहे तो मौजूदा व्यवस्था की विशेषज्ञ समिति के जरिए व्यापक समीक्षा करा सकती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि याचिका खारिज किए जाने का फैसला केंद्र को इस मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से विचार करने से नहीं रोकता। सरकार यह जांच कर सकती है कि मौत की सजा देने का कोई दूसरा तरीका कैदी की गरिमा बनाए रखते हुए अनावश्यक पीड़ा को कम कर सकता है या नहीं। यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से 2017 में दायर याचिका से जुड़ा था। याचिका में मौत की सजा देने के लिए फांसी के मौजूदा तरीके को खत्म करने की मांग की गई थी। याचिका में दलील दी गई थी कि फांसी के बजाय ऐसे विकल्पों पर विचार होना चाहिए जिन्हें कम पीड़ादायक माना जाता है। इनमें नसों में जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, बिजली का झटका और गैस चैंबर जैसे तरीके शामिल थे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील भी रखी गई थी कि मौत की सजा पाए कैदी को कम से कम फांसी और जहरीले इंजेक्शन जैसे तरीकों में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की समिति बनाने की संभावना पर विचार किया था। उस समय कोर्ट ने केंद्र से मौत की सजा देने के तरीकों से जुड़े बेहतर और ठोस आंकड़े भी मांगे थे। मामले में कोर्ट के सामने एक अहम सवाल यह भी था कि क्या मौजूदा फांसी की प्रक्रिया को संवैधानिक मानकों के अनुरूप माना जा सकता है और क्या किसी दूसरे तरीके से कैदी की गरिमा और पीड़ा से जुड़े पहलुओं को बेहतर तरीके से संबोधित किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह विधायिका को किसी खास तरीके से मौत की सजा लागू करने का निर्देश नहीं दे सकता। यानी फांसी की जगह कोई नया तरीका लागू करने का फैसला कानून और सरकार के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। केंद्र सरकार ने पहले इस व्यवस्था का बचाव किया था। 2018 में केंद्र ने अदालत को बताया था कि जहरीले इंजेक्शन या गोली मारने जैसे वैकल्पिक तरीके जरूरी तौर पर कम दर्दनाक साबित हों, यह तय नहीं है।

गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे में कहा गया था कि फांसी की प्रक्रिया तेज होती है और इसमें कैदी की पीड़ा को अनावश्यक रूप से बढ़ाने वाला कोई पहलू नहीं है। यह हलफनामा उस जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया गया था जिसमें विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया था। इस रिपोर्ट में मौत की सजा देने के मौजूदा तरीके में बदलाव की जरूरत पर विचार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल भारत में मौत की सजा लागू करने के मौजूदा कानूनी तरीके में कोई बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि कोर्ट की टिप्पणी से यह रास्ता खुला है कि केंद्र सरकार विशेषज्ञों के जरिए इस पूरी प्रक्रिया की वैज्ञानिक, मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से समीक्षा कर सकती है।

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