अकाली दल-भाजपा गठबंधन की वापसी की आहट? हरसिमरत बादल के बयान से चर्चा तेज

पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच पुराने गठबंधन की वापसी को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की 41वीं पुण्यतिथि पर आयोजित रैली में हरसिमरत कौर बादल के बयान ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। हरसिमरत ने सीधे तौर पर भाजपा का नाम नहीं लिया, लेकिन दिल्ली के साथ तालमेल और बेहतर संबंधों की जरूरत पर जोर देकर एक बड़े राजनीतिक संकेत जरूर दिए। हरसिमरत कौर बादल ने पंजाब के विकास के लिए केंद्र के साथ बेहतर समन्वय को जरूरी बताया। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है। खासकर इसलिए क्योंकि अकाली दल और भाजपा लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में एक-दूसरे के मजबूत सहयोगी रहे हैं। दोनों दलों के बीच 2020 में कृषि कानूनों को लेकर रिश्ता टूट गया था।

अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की चुनावी राजनीति में करीब ढाई दशक तक प्रभावशाली रहा। 1997 में दोनों दलों ने मिलकर शानदार प्रदर्शन किया और सरकार बनाई। उस चुनाव में अकाली दल ने 75 और भाजपा ने 18 सीटें जीती थीं। गठबंधन को कुल 93 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला था। 2007 में भी अकाली दल और भाजपा ने मिलकर सत्ता में वापसी की। इस चुनाव में अकाली दल को 49 और भाजपा को 19 सीटें मिलीं। गठबंधन ने कुल 68 सीटों के साथ सरकार बनाई। इसके बाद 2012 का विधानसभा चुनाव भी दोनों दलों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। 2012 में अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर पंजाब की राजनीति में नया रिकॉर्ड कायम किया। अकाली दल ने 56 और भाजपा ने 12 सीटें जीतीं। कुल 68 सीटों के साथ गठबंधन सत्ता में लौटा। राज्य के पुनर्गठन के बाद यह पहला मौका था जब किसी सत्तारूढ़ गठबंधन ने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी।

हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव तक इस गठबंधन की पकड़ काफी कमजोर हो चुकी थी। अकाली दल को महज 15 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा तीन सीटों पर सिमट गई। आम आदमी पार्टी के मजबूत उभार और कांग्रेस की वापसी ने पंजाब के पुराने राजनीतिक समीकरण को काफी बदल दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अकाली दल और भाजपा ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा। दोनों दलों ने मिलकर पंजाब की चार लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। हालांकि इसके बाद कृषि कानूनों का मुद्दा दोनों दलों के बीच बढ़ते मतभेद का कारण बना और सितंबर 2020 में अकाली दल ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने का फैसला किया। इसके बाद दोनों दल अलग-अलग राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़े। विधानसभा चुनावों में अकाली दल ने अपना अलग राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश की, जबकि भाजपा ने भी पंजाब में संगठन विस्तार और अपने दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम किया। ऐसे में अब हरसिमरत कौर बादल के ताजा बयान ने गठबंधन की संभावित वापसी को लेकर राजनीतिक चर्चाओं को फिर तेज कर दिया है।

हालांकि अभी तक अकाली दल या भाजपा की ओर से किसी नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए हरसिमरत के बयान को फिलहाल राजनीतिक संकेत के तौर पर ही देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के नेताओं के बयान और बैठकों से तस्वीर ज्यादा साफ हो सकती है। अगर दोनों पुराने सहयोगियों के बीच फिर से समझौता होता है, तो इसका असर पंजाब की पूरी चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है। अकाली दल के पास ग्रामीण पंजाब में पुराना संगठनात्मक आधार है, जबकि भाजपा का शहरी क्षेत्रों में अपना प्रभाव और केंद्र की राजनीति में मजबूत स्थिति है। दोनों के संभावित साथ आने से चुनावी समीकरणों में बड़ा बदलाव हो सकता है। दूसरी ओर, पंजाब में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल भी इस संभावित गठजोड़ पर नजर रखेंगे। अकाली दल और भाजपा के बीच दोबारा तालमेल होने की स्थिति में सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व, चुनावी मुद्दों और साझा अभियान तक कई सवाल सामने आएंगे। फिलहाल हरसिमरत कौर बादल का बयान पंजाब की सियासत में एक नए राजनीतिक अध्याय की संभावना की ओर इशारा कर रहा है। क्या यह केवल केंद्र के साथ बेहतर संबंधों की बात है या फिर अकाली दल-भाजपा गठबंधन की वापसी की जमीन तैयार हो रही है, इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से ही मिलेगा।

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