वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर बड़ा सवाल, उत्तराखंड में ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म-7 से 95 हजार से ज्यादा नाम कटने का दावा – Alam E Tasveer
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वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर बड़ा सवाल, उत्तराखंड में ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म-7 से 95 हजार से ज्यादा नाम कटने का दावा

देहरादून। उत्तराखंड समेत कई राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म-7 के इस्तेमाल और इसे लेकर स्पष्ट लिखित दिशा-निर्देशों की स्थिति पर बहस तेज हो गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में इस प्रक्रिया के तहत 95 हजार से अधिक मतदाताओं से जुड़े फॉर्म-7 तैयार किए गए। इस मामले ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया की पारदर्शिता तथा जवाबदेही पर चर्चा को बढ़ा दिया है।

क्या है ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म-7 का पूरा मामला?

मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जाता है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान कुछ राज्यों में निर्वाचन अधिकारियों की ओर से मतदाता रिकॉर्ड में विसंगतियां मिलने पर चुनाव आयोग के ERONet सॉफ्टवेयर के माध्यम से फॉर्म-7 स्वतः तैयार किए जाने का मामला सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं। विवाद का मुख्य विषय यह है कि अधिकारियों द्वारा मतदाता को अयोग्य श्रेणी में दर्ज करने के बाद सिस्टम से तैयार होने वाले फॉर्म-7 की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित की गई और इसके लिए क्या लिखित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) निर्धारित थी।

ERONet सॉफ्टवेयर के जरिए कैसे तैयार हुए फॉर्म?

ERONet निर्वाचन अधिकारियों के लिए तैयार किया गया एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसका इस्तेमाल मतदाता पंजीकरण, रिकॉर्ड में संशोधन और मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़ी प्रक्रियाओं के प्रबंधन में किया जाता है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर भी इस प्रणाली की जानकारी उपलब्ध है। रिपोर्टों के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कुछ मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां मिलने या आवश्यक दस्तावेजों के सत्यापन से जुड़े मामलों में अधिकारियों ने संबंधित मतदाताओं की पात्रता पर निर्णय लिया। इसके बाद सिस्टम के माध्यम से फॉर्म-7 स्वतः तैयार होने की प्रक्रिया अपनाई गई। हालांकि, फॉर्म का स्वतः तैयार होना और किसी मतदाता का नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटाया जाना अलग-अलग चरण हैं। इन दोनों के बीच सत्यापन, सुनवाई और निर्धारित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण है।

उत्तराखंड में 95 हजार से अधिक मामलों पर चर्चा

उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लगभग 1.73 लाख फॉर्म-7 आवेदन सामने आने की जानकारी सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों में दी गई थी। इनमें 95 हजार से अधिक मामले ऐसे बताए गए, जिनमें संबंधित मतदाताओं को सत्यापन प्रक्रिया के बाद अंतिम मतदाता सूची के लिए अयोग्य श्रेणी में चिह्नित किया गया था।  मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, संबंधित मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां थीं। निर्धारित सुनवाई के दौरान आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने या मतदाता अथवा उनके परिवार के सदस्य के उपस्थित नहीं होने की स्थिति में अधिकारियों द्वारा उन्हें अयोग्य चिह्नित किए जाने के बाद सिस्टम से फॉर्म-7 तैयार हुए। वहीं, इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी सवाल उठाए गए। विवाद का प्रमुख मुद्दा यह है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को अयोग्य श्रेणी में रखने और उनके नाम हटाने की प्रक्रिया में पर्याप्त जांच तथा पारदर्शिता सुनिश्चित हुई या नहीं।

फॉर्म-7 दाखिल करने के नियम क्या कहते हैं?

मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया और निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका को लेकर चुनावी नियमों का पालन आवश्यक है। फॉर्म-7 के माध्यम से नाम हटाने का अनुरोध किया जाता है, जबकि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) संबंधित मामले की जांच और निर्णय की जिम्मेदारी निभाता है। इस मामले में उठे सवालों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मैनुअल में निर्धारित प्रक्रिया और ERONet पर अपनाए गए डिजिटल तरीके के बीच किस प्रकार तालमेल स्थापित किया गया। विशेष रूप से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म किन परिस्थितियों में तैयार किए जा सकते हैं, उनके सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी है और प्रभावित मतदाताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर कैसे मिलता है।

चुनाव आयोग की प्रक्रिया और जवाबदेही पर उठे सवाल

ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म-7 को लेकर सामने आई रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग की ओर से अलग से कोई लिखित SOP जारी नहीं की गई थी। इस दावे के संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि डिजिटल फॉर्म तैयार करने की व्यवस्था, उसके बाद की कार्रवाई और मतदाता सूची से नाम हटाने के अंतिम निर्णय के लिए लागू नियमों की अलग-अलग जांच की जानी चाहिए। दूसरी ओर, उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से पहले दी गई जानकारी में कहा गया था कि संबंधित अधिकारियों द्वारा मतदाताओं को अयोग्य चिह्नित किए जाने के बाद सिस्टम से फॉर्म-7 तैयार हुए। इसलिए इस पूरे मामले में प्रक्रिया संबंधी सवालों के साथ निर्वाचन अधिकारियों के स्पष्टीकरण को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

मतदाताओं के लिए क्या है महत्वपूर्ण जानकारी?

मतदाता सूची में नाम की स्थिति को लेकर किसी भी नागरिक को संदेह हो, तो उसे अपने नाम की जांच आधिकारिक मतदाता सेवा पोर्टल पर करनी चाहिए। यदि पात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं है, तो लागू नियमों के तहत नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन किया जा सकता है। मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए। ऐसे में फॉर्म-7 की प्रक्रिया, सत्यापन के मानकों और मतदाताओं को उपलब्ध शिकायत एवं सुधार के विकल्पों पर स्पष्ट जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड में 95 हजार से अधिक मामलों से जुड़ा यह विवाद अब निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता, तकनीकी प्रणाली की जवाबदेही और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है। मामले के सभी पहलुओं को समझने के लिए आधिकारिक नियमों, निर्वाचन अधिकारियों के स्पष्टीकरण और सामने आई रिपोर्टों का समग्र आकलन जरूरी है।

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